तुलसीदास के गुरु कौन थे|tulsidas ke guru kaun the

तुलसीदास के गुरु कौन थे तुलसीदास जी एक महान संत थे जिनके नाम को परिचय की जरूरत नही हिन्दुधर्म के महान ग्रंथो में से एक रामायण की रचना की और संसार को एक अलग ही शिक्षा दी!

श्री रामचरितमानस एक ग्रन्थ ही नही है बल्कि इस से जीवन को किस प्रकार जिया जाये इसका सार लाभ भी है!

तुलसीदास के गुरु कौन थे
तुलसीदास के गुरु कौन थे

tulsidas ke guru kaun the तुलसीदास के गुरु

जब तुलसी दास अपनी पत्नी पर अधिक प्रेम होने के कारण पत्नी के पीछे जब वे अपने ससुराल चले गये तो उनकी पत्नी द्वारा कटु वचन सुनने के बाद की मेरा यह शरीर इतना मेला है इसके अंदर हाड़ मास के आलावा कुछ भी नही है फिर भी आप इतना प्रेम करते है अगर इसका आधा आप “राम नाम” से प्रेम करते तो भगवान आपको मिल गये होते!

इस कारण तुलसीदास को ये बात लगी और वे उसी समय वहा से चल दिए और प्रयाग , द्वारिका , बद्रीनाथ , जगनाथ , और रामेश्वरम आदि प्रभु धाम पर पैदल ही गये इसी बिच आपने श्री नरहर्यानन्द जी को आपने आपना गुरु बनाया! और तुलसीदास जी संसार से विरक्त यानि की सन्यास ले लिया!

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तुलसीदास भक्ति काल के समय में हुए थे और तुलसी के समय में महाराणा प्रताप और अकबर में द्वन्द चल रहा था तुलसी ने महाराणा प्रताप के भाई मानसिंह से भी मुलाकात हुई तुलसीदास को अकबर ने भी बुलावा भिजवाया था परन्तु तुलसी ने इन्कार कर दिया

दो चोर और तुलसीदास

एक बार दो चोर तुलसी के आश्रम पर आने लगे ताकि उन्हें कुछ मिल जाये परन्तु जब भी आते उन्हें दो बालक पहरे पर मिलते tulsidas ke guru

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चोरो ने 2 – 3 दिन प्रयत्न किये परन्तु जब भी वे आते उन्हें वे दो बालक पहरे पर मिलते तो एक दिन सुबह उन्होंने तुलसी के आश्रम पर गए और तुलसीदास जी से पूरी बात कही तो तुलसी जी ने कहा कहो क्या लेने आये हो

अब तो उन्होंने कहा की आप उन दोनों सुन्दर बालको से हमे मिला दो तो तुलसी की आँखे नम हो गई और वे समझ गए की वे और कोई नहीं उनके प्रभु है जो की मेरी कुटिया में थोड़ा धन होने के कारण उनको रखवाली करनी पड़ती है तो किस काम का है ये मेरा धन जो मेरे प्रभु को कष्ट दे रहा है इस लिए तुलसी ने दूसरे दिन ही अपने पास रखे घन को बांट दिया

तुलसीदास के दोहे

तुलसीदास राम जी के महान भक्त होने के साथ साथ तुलसी दास जी कवियों में भी सिरोमणि थे तुलसी दास के दोहे आज भी प्रशिद्ध है रामायण की चोपाइयो को पहले सास्कृत में लिखा फिर उसको चोपाइयो के रूप में उतारा जेसे रघु कुल रित सदां चलीआई, प्राण जाये पर वचन ना जाये! इस तरह से तुलसी दास ने बहुत सी अपनी क्र्तियों लिखी 

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अब तुलसी के पास जो भी थोड़ा बहुत धन था वो भी अब तुलसी ने लुटा दिया की मेरे कारण मेरे प्रभु परेशान होते है 

तुलसीदास के गुरु कौन थे आज का पोस्ट में हमने आपको बताया की तुलसीदास जी इतने महान थे की उन्हें भगवान की भी चिंता थी भला इतने अच्छे भक्तो को भगवान क्यों नही मिलेंगे अगर आपको ये कथा अच्छी लगी तो आप कमेन्ट में जय श्री राम लिखे !

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