सूरदास किसके भक्त थे | surdas kiske bhakt hai

सूरदास
सूरदास का जन्म आगरा से मथुरा जाने वाली सड़क पर रुनकता ग्राम में 1478 ईस्वी में हुआ था। विद्वानों में इनके जन्मांध होने को लेकर मतभेद है। surdas kiske bhakt hai

सूरदास ब्राह्मण समाज में पैदा हुए थे। 18 वर्ष तक निकटवर्ती ग्राम में रहकर संगीत का अध्ययन किया। सत्संग के प्रभाव से ही इन्हें धर्म शास्त्रों का ज्ञान हो गया।

इनके गुरु का नाम वल्लभाचार्य था। सूरदास अष्टछाप के प्रमुख कवि हैं। इनकी मृत्यु पारसोली ग्राम में 1538 ईसवी में हो गई। पहले यह महान राम भक्त थे

बाद में वल्लभाचार्य से शिक्षा पाकर कृष्ण भक्ति में लीन हो गए। सूरदास ने वल्लभाचार्य की आज्ञा के अनुसार कृष्ण चरित्र का अध्ययन किया।

सूरदास को कुछ लोग पृथ्वीराज चौहान के समा कालीन चंद्रवरदाई का वंशज मानते हैं। जन्मांध अथवा जन्म के बाद अंधे हुए इस बात को लेकर विद्वानों में मतभेद है।

सुरदास बचपन से ही संगीत में निपुण थे। सूरदास आगरा मथुरा के बीच गुरु घाट पर रहकर भजन कीर्तन करते थे।इनके पिता का नाम पंडित राम दास था।

सूरदास ने प्रकृति सौंदर्य का ऐसा वर्णन किया है की कोई जन्मांध व्यक्ति ऐसा वर्णन नहीं कर सकता।
सूरदास कृष्ण भक्ति के कवियों में प्रमुख कवि माने जाते हैं।

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इनकी रचनाएं इतनी काव्यांश पूर्ण है कि आगे आने वाली कवियों की सिंगार एवं वात्सल्य की रचनाएं इनकी जूठन सी जान पड़ती है।

इनका प्रमुख लक्षण कृष्ण सेवा का वर्णन करना है। इन्होंने श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का मनोहारी का वर्णन किया है जो आंखों देखी प्रत्यक्ष के बिना असंभव है।

सूरदास कृष्ण भक्त होने के साथ-साथ महान समाज सुधारक भी थे। इन्होंने समाज में फैले अंधविश्वास और अज्ञानता को दूर किया।

सूरदास ने स्त्रियों को समाज में प्रमुख स्थान दिलवाया। सूरदास जन्मांध होने के बावजूद भी प्रकृति सौंदर्य एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर चित्रण किया है बिना असंभव है।सूर का अलंकार विज्ञान उत्कृष्ट है।

उसमें शब्द चित्र उपस्थित करने एवं प्रसंगों की वास्तविक अनुभूति कराने की पूर्ण क्षमता है। सूर ने अपने काव्य में अन्य अनेक अलंकारों के साथ उपमा उत्प्रेक्षा और रूपक का कुशल प्रयोग किया है।
सूर्य की भाषा बृज भाषा है।

साधारण बोलचाल की भाषा को परिष्कृत कर उन्होंने उसे साहित्यिक रूप प्रदान किया है। उनके काव्य में बृज भाषा का स्वाभाविक, सजीव और भावना कुल प्रयोग है।

सूरदास किसके भक्त थे

सूरदास के सभी पद गए हैं और वह किसी न किसी राग से संबंधित है। उनके पदों में काव्य और संगीत का अपूर्व संगम है इसीलिए सूरसागर को राग सागर भी कहा जाता है।

सूर सरावली और साहित्य लहरी सूरदास की अन्य प्रमुख काव्य कृतियां हैं। सूरदास ने कृष्ण के जन्म से लेकर मथुरा जाने तक की कथा और कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का वर्णन अपनी सहजता मनोवैज्ञानिक ता और स्वभाव एकता के कारण अद्वितीय है।

सूरदास मुख्यतः वात्सल्य और श्रृंगार के कवि हैं। सूरदास का वात्सल्य का सम्राट कहा जाता है। सूरदास ने अपनी रचनाओं में भावों को बृज भाषा के माध्यम से व्यक्त किया है।

सूरदास के 1 पद से प्रभावित होकर वल्लभाचार्य ने सूरदास को अपना शिष्य बना लिया। सूरदास को बल्ब आचार्य श्री नाथ के मंदिर में भजन कीर्तन और सेवा का भार सौंप दिया।

इनकी प्रमुख रचना सूरसागर में संसार का साभार है। साहित्य लहरी में श्री कृष्ण की बाल लीलाएं तथा कहीं-कहीं महाभारत का वर्णन है। सूरदास के विवाह को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है।

कुछ विवाहित मानते हैं और कुछ नहीं। सूरदास कृष्ण भक्ति और समाज सेवा करते हुए स्वर्गवास हो गए। सूरदास की साहित्य में प्रमुख प्रधानता आज भी विद्यमान है।

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