मीराबाई के गुरू कौन थे | mirabai ke guru kaun the

जब कहीं भक्ति की चर्चा होती है तब वहां मीराबाई का नाम पहले स्थान पर होता है। मीराबाई भगवान श्री कृष्ण की परम भक्त थीं। (mirabai ke guru kaun the)

प्रारंभ से ही मीराबाई के घर संतों का आना जाना लगा रहता था इसलिए मीरा बाई संतो के संपर्कों मैं आकर मीराबाई भगवान श्रीकृष्ण से प्रभावित हुई

और उनकी भक्ति बचपन काल से ही प्रारंभ कर दी।मीराबाई का जन्म 1498 ईस्वी के लगभग राजस्थान के मेड़ता के कुड़की ग्राम में हुआ था।

इनके पिता का नाम राम रतन सिंह था तथा माता का नाम कुसुम कुंवर थी। बचपन मी मीराबाई की माता की कारण वंश मृत्यु हो जाती उसके पश्चात मीराबाई अपने दादा के साथ रहने लगती है।वैसे मीराबाई ने श्री कृष्ण को अपना पति मान लिया था

Meera ke Guru kaun the
Meera ke Guru kaun the

लेकिन मीराबाई के पिता और दादा श्री ने इनका विवाह उदयपुर के राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ कर दिया था।भोजराज भी भगवान की भक्ति करते थे

इसलिए भोजराज मीराबाई को मंदिर तथा अन्य धार्मिक स्थलों पर जाने से नहीं रोकते थे। विवाह के कुछ समय पश्चात एक युद्ध में मीराबाई के पति भोजराज की मृत्यु हो गई।

उसके पश्चात मीराबाई भगवान श्री कृष्ण की भक्ति करते हुए उनके प्रेम में खो गई। जब मीराबाई भी एक महान संत भगवान की परम भक्त थी साथी समाज में प्रसिद्ध थी

तो उनके गुरु कोई सामान्य साधारण व्यक्ति तो नहीं हो सकते वह भी कोई महान हस्ती होगी। मीराबाई के गुरु श्री रैदास जी थे उन्होंने मीराबाई की भक्ति से प्रभावित होकर मीराबाई को अपना शिष्य बना लिया और उन्हें भक्ति ज्ञान दिया। मीराबाई के गुरु भक्ति मार्ग पर ही चलते थे

वह अज्ञानता के जाल में फंसे लोगों को बाहर निकालने के लिए पर्यटन करते रहते थे।मीराबाई के पति की मृत्यु के बाद इनके देवर राणा बने

उन्होंने मीराबाई को बहुत कष्ट दिए उन्होंने मीराबाई को मारने के लिए जहर भी दिया लेकिन वह जहर भगवान की भक्ति के कारण अमृत बन गया।

मीराबाई के द्वारा भगवान श्री कृष्ण के प्रति बहुत सही प्रेम गीत बनाए गए थे जिनमें से कुछ वर्तमान समय में लोकप्रिय भी हैं। इनके पिता रात दिन युद्धों में ही लगे रहते थे

इसी कारण मीराबाई की शिक्षा पर किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया मीराबाई ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी। मीरा ने समय और परिस्थिति के आधार पर लोक लाज और कुल मर्यादा के नाम पर प्रचलित बंधनों का विरोध किया।

मीराबाई ने समाज में प्रचलित कई प्रथाओं का विरोध किया जिससे लोक कल्याण में सहायता हुई।भगवान श्री कृष्ण की रचना करते हुए

मीराबाई ने अनेक लोकगीत पद की रचनाएं की जिन्हें साहित्य में प्रमुख स्थान मिला इसी कारण मीराबाई एक प्रमुख साहित्यकार भी रही थी इनकी रचनाएं वर्तमान समय में भी स्कूल या कॉलेज में पढ़ाई जाती है।

इन्होंने अपनी रचनाओं में भगवान श्री कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का व्याख्यान किया है।मीराबाई घर परिवार को छोड़कर संतो के संग रहने लगी भगवान श्री कृष्ण की प्रेम भक्ति करने लगी

इसी कारण उन्हें लोक का भी सामना करना पड़ा। मीराबाई ने मरते दम तक भगवान श्री कृष्ण की अटूट भक्ति की।

भगवान का नाम लेते लेते संत मीरा बाई की 1546 ईस्वी में द्वारका के आसपास इनकी मृत्यु हो गई। मीराबाई को साहित्य तथा लोक समाज में वर्तमान समय में भी बहुत ही स्मान तथा आदर दिया जाता है।

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