मीराबाई के गुरु कौन थे | Meera ke Guru kaun the

(Meera ke Guru kaun the) मीराबाई के बारे में तो आप सभी लोगो ने सुना ही होगा मीरा कलयुग में जन्मी एक महान भक्ति मति थी मीरा के प्रभु गिरधर नागर राधा के मनमोहना राधा श्री कृष्ण की प्रेमिका थी और मीरा ने भगवान कृष्ण को अपना पति परमेश्वर माना था मीरा और राधा कृष्ण प्रेमिका के रूप में ही जानी जाती है तो आइये जानते है मीरा के पुरे जीवन चरित्र के बारे में

मीराबाई के माता पिता का नाम

मीरा का जन्म मेड़ता में सन 1498 ई. में हुआ था मीरा के पिता का नाम रतनसीह था और माता का नाम वीरकुमारी था

कहते है मीरा के माता-पिता की मृत्यु अल्पकाल में ही हो गई थी इस लिए मीरा का लालन पालन उनके दादा श्री ने ही किया था जिनका नाम रावदुदा था

मीराबाई
मीराबाई

रावदुदा एक धार्मिक प्रवृति के वयक्ति थे इस लिए मीरा के घर में हमेसा ही साधु संतो का आना जाना रहता है एक बार मीरा के घर में साधुओ को भोजन करवाया मीरा उन्हें बहुत ही ध्यान से देख रही थी

मीरा ने देखा की एक साधु बाबा ने अपने साथ एक मूर्ति को भोजन करवाया था जब वे साधु जाने लगे तो मीरा ने उस साधु को पीछे से छोलि पकड़ी और कहा की आपने जिसको भोग लगाया वो मुझे दे दीजिये साधु ने मना किया परन्तु मीरा बालिका थी

जिद पर अड़गई तो साधु ने कहा की एक शर्त पर में तुम्हे ये दूंगा की तुम इसे रोज खाना खिलाना और नहलाना सुलाना और मीरा से कहा की इनका नाम गिरधरगोपाल जी है मीरा ने अपनी माँ से कहा की ये मेरा बिंद है

यहाँ से ही मीरा की भक्ति शुरू होती है इस तरह मीरा ने भक्ति में प्रवेश किया मीराबाई शादी कुँवर भोजराज से कर दी गई कुंवर भोज के पिता यानि मीराबाई के ससुर का नाम राणा सांगा था

जिन्हे संग्रामसिंह भी कहते है मीरा कुंवर भोज की पत्नी के सारे धर्म निभाती साथ ही वे श्री कृष्ण की भक्ति में भी कमी नहीं आने देती थी

जैसे जैसे कुंवर भोज का समय मीरा संग बिता तो उन्हें पता चला की मीरा श्री कृष्ण की बड़ी भक्त है फिर भी मीरा के लिए कुंवर ने कृष्ण का मंदिर बनवा दिया

मीराबाई

और अब तो मीरा का सारा दिन पूजा पाठ में व्यतीत होने लगा था तब कुंवर ने मीरा की भक्ति के बिच में आना अच्छा नहीं समझा और मीरा की सहमति से दूसरी शादी कर ली जिस से मीरा को कोई आपत्ति नही थी

अब तो मीरा सारा दिन अपनी कृष्ण भक्ति में डूबी रहती थी कुछ समय बाद मीरा के पति की मृत्यु हो गई और थोड़े समय बाद राणासांगा की भी मृत्यु हो गई अब मीरा सन्यासी की तरह रहती ना सुध थी

साधु संतो के संग गाती “मेरो तो गिरधर गोपाल दुसरो ना कोई ” इस तरह मीरा अब लोकलाज को त्याग रहती राणासांगा की मृत्यु के पश्चात भोजराज के छोटे भाई को राणा का पद सौंपा गया

एक बार साधुओ की टोली आयी हुई थी तो मीरा भी उनके प्रवचन सुनने चली गयी तभी संत रविदाश के प्रवचन से प्रभावित हो मीरा ने उन्हें अपना गुरु बना लिया अब नये राणा रत्नसिह मीरा का यु साधु संतो से मिलना जुलना सतसंग में जाना अच्छा नहीं मानते थे

वे ये सब अपनी लोकलाज अपनी परम्परा का अपमान मानते थे इस लिए उन्होंने मीरा को समझाया लेकिन मीरा ठहरी उस बंसीवाले की भक्त उसे सुध ही कहा थी इस लिए मीरा को मारने का प्रयास भी किया गया मीरा को जहर पिलाया गया

ये कहकर की ये भगवान का चरणामृत है मीरा को दासी ने बताया भी था की ये जहर है लेकिन मीरा ने कहा की इसके साथ मेरे गिरधरगोपाल का नाम जुड़ा है तो में ये जरूर पियूँगी और मीरा ने वैसा ही किया और मीरा जहर से भरा कटोरा पी गई

जिस पर भला उस मोरमुकुट वाले की कृपया हो भला उसे कोई मार सकता है क्या इसी प्रकार मीरा को सांप से और शेर से भी मारने के प्रयास किये लेकिन मीरा हर बार बच जाती एक बार आर्त होकर मीराबाई ने गोस्वामी जी को पत्र लिखा और अपनी वेदना उनसे कहि तभी मीरा को गोस्वामी जी ने वापिस पत्र लिखा

और घर छोड़ने के लिए कहा पत्र के मिलते ही मीरा कुछ समय बाद मीरा घर छोड़ कर वृन्दावन चली गयी मीरा वहा गोस्वामी जी से भी मिली लेकिन गोस्वामी जी महिलाओ से मिलते नहीं थे जब गोस्वामी जी ने मीरा को देख अंदर से दरवाजे बंद कर

लिए तो मीरा ने कहा स्वामी जी आप मुझसे इस लिए नहीं मिलते क्योंकि में एक औरत हु जबकि सत्य तो ये है की मेरे गिरधर गोपाल के अलावा कोई पुरुष है ही नहीं सभी महिलाएं ही है

जब स्वामी जी ने ये गुड़ भरी वाणी सुनी तो उन्हें मीरा का प्रभाव पता चला फिर मीरा से स्वामी जी मिले इस तरह मीरा का प्रभाव सभी ने जाना जबसे मीरा वृन्दावन आई पीछे से मेवाड़ में जनहानि उपद्रव आक्रमण और प्राकृतिक आपदा शुरू हो गई

Meera ke Guru kaun the

और अंत में रत्नसिह को किसी साधू ने कहा की आपके राज्य से एक संत नाराज़ या क्रोधित होकर गया है तभी उसे अपनी भाभी की याद आई और उन्होंने तुरंत ही मीरा को वापिस लाने के दूत भेजे लेकिन मीरा ने आने से साफ माना कर दिया

और फिर रत्नसिह स्वयं भी गया लेकिन मीरा नहीं मानी अंत में मीरा बाई एक दिन कृष्ण भक्ति में इतना खो गई की वे कृष्ण की मूर्ति में समा गई

Meera ke Guru kaun the और पीछे निसानी के रूप मीरा की साडी का पलु रह गया ये थी मीरा की भक्ति अगर आपको मीरा की कहानी अच्छी लगी तो आप शेयर करे और कमेंट करे जय श्री गिरधर गोपाल!

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