मंदोदरी किसकी पुत्री थी | मंदोदरी का जन्म से लेकर पूरी कथा

मंदोदरी किसकी पुत्री थी आज हम आपको मन्दोदरी की कथा सुनायेंगे जिसमे हम हमेसा से उठाते रहे सवालों के बारे में बात करेंगे

जो की रावण पत्नी मन्दोदरी के बारे में पूछे जाते है जेसे मंदोदरी किसकी पुत्री थी,

मंदोदरी का जन्म, मंदोदरी के पिता का नाम,

मंदोदरी कहां की थी इस कथा को पढने के बाद आपको कोई मंदोदरी कथा के बारे में आपको कोई उलझा नही सकेगा!

मंदोदरी किसकी पुत्री थी
मंदोदरी किसकी पुत्री थी

मंदोदरी किसकी पुत्री थी मन्दोदरी की कथा के सारे सवालों के जवाब

त्रिपुरनिर्माता, दानवराज मयने अप्सरा हेमासे परिणय किया अप्सरा कबतक दानवपुरीमें रहती। देवताओं के कहने पर वह स्वर्ग चली गयी।

नवजात पुत्रीको वह दानवराज के समीप छोड़ती गयी।

मयने पुत्रीका नाम मन्दोदरी रखा पत्नीके वियोगसे व्याकुल हो मयका सारा स्नेह पुत्रीमें दित हो गया।

वे स्त्री-वियोगसे कातर इधर-उधर भटकते रहते थे। स्वर्णपुरीमें उन्हें विश्राम नहीं मिलता था। अपनी कन्याको वे सदा अपने साथ ही रखते थे।


वे अपनी कन्याको लिये पृथ्वीपर घोर अरण्यमें घूम रहे थे।

मन्दोदरीने पंद्रहवें वर्षकी आयुमें प्रवेश किया था। मन्दोदरी सौन्दर्यमयी किशोरीमें तारुण्यने प्रवेश पाया था।

मंदोदरी ने रावण से विवाह क्यों किया

अकस्मात् राक्षसराज रावणसे मयका वहीं साक्षात् हो गया। अभी रावण अविवाहित था। दानवेन्द्र और राक्षसेन्द्रका परस्पर परिचय हुआ।

पितामह ब्रह्माके प्रपौत्र रावणने अपने वंशका परिचय देकर मयसे कन्याकी याचना की।

दानवेन्द्रको सयोग्य पात्र मिला। उन्होंने वहीं रावणको विधिवत् कन्यादान किया।

दहेजमें अनेक दिव्यास्त्र तथा अमोघ शक्ति दी। इस प्रकार मन्दोदरी रावणकी पट्टमहिषी हुई।

mandodari kaun thi

रावण राक्षस जाती का होने के कारण उसने अनेक देव, गन्धर्व एवं नागकन्याओंसे विवाह किया; परंतु मन्दोदरी सर्वप्रधान तथा सदा रावणको सबसे प्रिय रही।

मन्दोदरीने सदा रावणका कल्याण चाहा और उसे सदा सत्पथपर बनाये रखनेके प्रयत्नमें रही। उसने रावणके दुष्कृत्योंका सदा नम्रतापूर्वक विरोध किया।

। सतीत्व स्वयं एक महासाधन है और उससे समस्त सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। सती नारी केवल पतिसेवासे निःश्रेयसको भी सरलतासे प्राप्त कर लेती है।

मन्दोदरी एक सती

मन्दोदरीके सतीत्वने उसके हृदयमें स्वयं यह प्रकाश प्रकट कर दिया कि परात्पर पुरुषोत्तमका अवतार अयोध्यामें हो चुका है।

जब रावणने छलसे श्रीजनकनन्दिनीका हरण किया, तब मन्दोदरीने बड़ी नम्रता एवं शिष्टतापूर्वक उसे समझाया-‘नाथ! श्रीराम मनुष्य नहीं हैं;

वे सर्वेश्वर, सर्वसमर्थ, सच्चिदानन्दघन साक्षात् परम पुरुष हैं। उनका अनादर मत करें। वैदेही साक्षात् जगज्जननी योगमाया हैं। यह वैर आपके लिये योग्य नहीं।

श्रीजनकनन्दिनीको श्रीरामके समीप पहुँचा दें। लंका का राज्य मेघनादको दें। हम दोनों वनमें कहीं उन कोसलकुमारका ध्यान करें। वे करुणामय अवश्य आपपर कृपा करेंगे।’

एक-दो नहीं, अनेक बार चरण पकड़कर मन्दोदरीने पतिको समझाया। जब भी लङ्केश्वर अन्तःपुरीमें मिलता, यह साध्वी उससे आग्रहपूर्वक प्रार्थना करती।

पूरी रात्रि अनुनय एवं उपदेशमें व्यतीत हो जाती। जिस अहङ्कारीने ‘सीता देहु राम कहँ’ कहनेपर विभीषणको लात मारकर लङ्कासे निकाल दिया था,

जिसने वृद्ध नाना माल्यवन्तको भरी सभामें डाँटनेमें कोई संकोच नहीं किया, वही रावण कभी भी मन्दोदरीका तिरस्कार न कर सका।

हँसकर टाल जाता या उठकर चल | देता। वह जानता था कि पत्नी सच्चे हृदयसे उसका कल्याण चाहती है।


जो होना था, हो गया। सर्वात्माके संकल्पमें बाधा देना सम्भव नहीं। श्रीराघवेन्द्र पृथ्वीका भार दूर करने
साकेतसे पधारे थे। उन्हें तो रावण-वध करना ही था। |

रणक्षेत्रमें दशाननके शवपर रोती-बिलखती मयपुत्रीको उन्होंने कृपाकी दृष्टि से देखा।

शुद्ध हृदयपर भगवत्कृपा हुई। मायाका आवरण छिन्न हो गया। कहाँका शोक और कैसा मोह?

मन्दोदरी की इस कथा को पूरा पढने के बाद आपको मंदोदरी सम्बंधित सारे सवालो के जवाब मिल जायेंगे

इस कथा में हमने विशेस रूप से मंदोदरी किसकी पुत्री थी और रावण ने उस से केसे विवाह किया था ये सब जानकारिया दी है ये हमने ऋषिकेश गोरखपुर से लिया है

स्वामी राम सुखदास जी महाराज द्वारा रचित भगत चरितांक से लिया गया है जय श्री राम !

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