महाभारत युद्ध की कथा mahabharat story

महाभारत युद्ध महाभारत केवल कौरवों और पांडवो के बिच का युद्ध नहीं है बल्कि सत्य और असत्य के बिच का युद्ध है शक्ति और दुर्बलता के बिच का युद्ध है महाभारत केवल आपसी लड़ाई का परिणाम नहीं है बल्कि लिए गए ग़लत निर्णयों का परिणाम है जिसने बुराई का साथ दिया उस बड़े से बड़े योद्धा का वध हुआ है महाभारत एक महान युद्ध है जिसमे गीता जैसा ज्ञान भी दिया जाता है और भगवान अपनी प्रतिज्ञा भी तोड़ते है शास्त्र नहीं उठाने की आज में आपको बताने जा रहा हु की महाभारत क्यों हुआ क्या उस युद्ध को टाला नहीं जा सकता था इन सभी सवालों का जवाब आपको आज मिलने वाला है

महाभारत युद्ध
महाभारत युद्ध

महाभारत का युद्ध

यह कहानी तब शुरू होती है जब दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत अपना राज्य का युवराज घोषित करने वाले थे लेकिन उनकी दुविधा यह थीकि वह अपने पुत्रों में से किसी में भी राजा का गुण नहीं देखते थे

उस समय महाराज भारत का राज्य हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक हो गया था उस समय भारत का काम आर्यभट्ट था राजा भरत का पराक्रम और चक्रवर्ती सम्राट बनने के बाद आर्यभट्ट भारतवर्ष के नाम से जाने जाना लगा इसीलिए कहते हैं

भारत का नाम राजा भरत से पड़ा उन्हें लगता था कि जो भी राजा बनेगावह सही से प्रजा के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाएगा इसलिए महाराज भरत ने अपने किसी भी पुत्र को राजा ना बनाकर उन्होंने भारद्वाज पुत्र अभिमन्यु को राजा का पुत्र घोषित करके युवराज घोषित कर दिया यहीं से ही देखे तो महाभारत की अनकही घोषणा हो चुकी थी

महाभारत का युद्ध
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आगे चलकर महाराज शांतनु राजा बने महाराज शांतनु एक बार गंगा के किनारे शिकार खेल रहे थे तभी वहां गंगा प्रकट हुई महाराज शांतनु गंगा पर मोहित हो गए और उन्होंने गंगा से विवाह करने की बात है कहीं तो गंगा ने कहा की मैं एक ही शर्त पर आपसे शादी करूंगी

मैं कुछ भी करूंतो आप मुझे रोकेंगे नहीं जिस दिन आपने मेरे कुछ भी करने पर कोई भी प्रश्न किया या मुझे रोका तो मैं उसी दिन आपको और आपके राज्य को छोड़ कर चली जाऊंगी महाराज शांतनु गंगा पर इतने ज्यादा मोहित हो गए थे

कि उन्होंने कुछ भी सोचे समझे बिना गंगा की शर्त मान ली और गंगा महाराज शांतनु की पत्नी बन गईवह दोनों सुख पूर्वक हस्तिनापुर में रहने लगे तभी कुछ समय बाद  गंगा ने एक पुत्र को जन्म दिया और उस पुत्र को जन्म लेते ही नदी  गंगा में डूबा दिया ऐसे कर के गंगा सात पुत्रों को जन्म दिया और सभी को वह गंगा नदी में जन्म देते ही डूबा देती तभी महाराज शांतनु से यह सहन नहीं हुआ

महाभारत का युद्ध कितने दिन चला

और उन्होंने अंत में आठवे पुत्र प्रेम से व्याकुल होकर अपने वचन तोड़ दिया पुत्र को नदी में बहाने से रोक लिया और तभी उन्होंने गंगा से यह सवाल किया कि तुमने मेरे साथ पुत्र 7 पुत्र नदी में बहा दिए तुम कैसी मां हो तभी गंगा ने जवाब दिया

कि ऐसा मेने उनके ही श्राप से मुक्ति के लिए किया क्योंकि आप और मैं हमारे पुत्र 8 पुत्र  सभी श्राप को झेल रहे थे आप पिछले जन्म में राजा भिस्क और में ब्रम्हा पुत्री गंगा और हमारे सारे पुत्र 8 वसु थे

तभी जब आपने मुझे रोका कि मैं अपने ही पुत्रो को क्यों गंगा में बहा रही हु तभी में उस श्राप से मुक्त हो गई हूं और अब मैं आपको यह आठवां पुत्र वापस लोटा दूंगी इसकी शिक्षा पूरी होने के बाद तभी गंगा ने अपने आठवे पुत्र का नाम देवव्रत रखा था जोकि अपनी भीष्म प्रतिज्ञा के कारण भीष्म कहलाये

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आगे चलकर शांतनु का उनका ह्रदय एक मछुआरे की लड़की पर आ गया जब शांतनु ने उस मछुआरे की कन्या से शादी करने का विचार किया तो उसने भी एक शर्त रख दी की उसका जो भी पुत्र होगा वह राजा बनेगा तो देवव्रत ने जब यह समाचार सुना दो अपने पिता की इच्छा पूर्ति के लिए उसने प्रतिज्ञा ली जिसे भीष्म प्रतिज्ञा के नाम से जाना जाता है देवव्रत ने प्रतिज्ञा ली

महाराज शांतनु ने गंगा पुत्र देवव्रत को युवराज घोषित कर दिया और कि मैं आजन्म ब्रह्मचारी रहूंगा और हस्तिनापुर का रक्षा करूंगा तभी इस बात से महाराज शांतनु दुखी हुए लेकिन उन्होंने भीष्म पितामह को यह आशीर्वाद भी दिया

जब तक तुम चाहोगे तब तक इस धरती पर जीवित रहोगे यानी कि उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दे दिया जिस मछुआरे की लड़की से शांतनु महाराज का विवाह हुआ था वह सत्यवती थी सत्यवती के विवाह के उपरांत उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए एक का नाम विचित्रवीर्य दूसरा चित्रांगद था

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महाराज शांतनु थोड़े दिन बाद ही स्वर्ग लोग चले गए उसके बाद भीष्म ने चित्रांगद को राजा बनाया कुछ समय राज करने के बाद चित्रांगदा अपने नाम के एक गन्धर्व से युद्ध करते हुए उस से मारे गए उसके बाद विचित्रवीर्य को राजा बनाया जब विचित्रवीर्य के विवाह का समय आया

तब काशी प्रदेश में महाराज काशीनरेश अपनी तीनों पुत्रियों अंबा अंबिका अंबालिका का विवाह का स्वयंवर करने का निमन्त्रण काशी से कोई भी समाचार नहीं आया हस्तिनापुर को निमन्त्रण नही करने पर हस्तिनापुर के सभी लोग बड़े उदास हुए लेकिन भीष्म पितामा ने हस्तिनापुर ये अपमान समझा और कशी नरेश की 3 कन्याये हर लाये लेकिन इनमे से अंबिका से विचित्रवीर्य का विवाह नहीं हो सका जबकि अम्बा अम्बालिका से हो गया कुछ समय बाद महाराज विचित्रवीर्य की मृत्यु हो गई मृत्यु होने के बाद गंगापुत्र भीष्म पर फिर से यह बात चली आई

कि उन्हें शादी कर लेनी चाहिए क्योंकि विचित्रवीर्य के कोई भी संतान नहीं थी तभी माता सत्यवती ने उन्हें एक और रास्ता दिखाया जिससे भीष्म की प्रतिज्ञा भी ना टूटे सत्यवती को महर्षि पराशर से पहले ही एक संतान की प्राप्ति हो चुकी थी जिनका नाम वेदव्यास था इसलिए भीष्म ने वेदव्यास को हस्तिनापुर ले आये और उनकी शादी एक दिन के लिए अंबालिका अंबिका से करा दी वेदव्यास तपस्या से लौटे थे उनके चेहरे पर बड़ी-बड़ी दाढ़ी मूछें थी इसलिए उन्हें देख कर अंबिका ने आंखें बंद कर ली इसलिए उन्हें अंधे पुत्र की प्राप्ति हुई

महाभारत का युद्ध कितने दिन चला
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और अंबालिका उन्हें देखकर डर गई इसलिए उनका पुत्र स्वास्थ्य ठीक नहीं था सत्यवती ने जब यह सुना की दोनों बच्चो में कमी होगी तो उन्होंने अम्बा अम्बिका को दुबारा वेदव्यास से परिणय के लिए कहा इस बार उन दोनों राजकुमारियों ने अपनी दासी उनके पास भेज दी जोकि ना ही डरी न ही आँखे बंद की इस लिए उन्हें विदुर जैसे महान पुत्र की प्राप्ति हुई

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ध्रतराष्ट्र की सादी घनदार नरेश की पुत्री गांधारी से हुई और पाण्डु की सादी कुन्ती और राजकुमारी माधवी से हुई पाण्डु को राजा बनाया गया क्योंकि ध्रतराष्ट्र के आँखे नहीं थी पाण्डु जब शिकार खेल रहे थे तो उन्होंने एक शब्द भेदी बाण चलाया जिससे एक रिसी और उनकी पत्नी मारे गए तो ऋषि ने श्राप दिया की जब भी तुम अपनी पत्नी से प्रेम करेंगे तो उसी क्षण तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी तो पाण्डु ने सन्यास लेने का फैसला किया

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और जब पाण्डु वनवास को गए तो उन्होंने अपना मुकुट महाराज घृतरास्ट्र को देते गए और अंत मे कुंती को वरदान था की जब भी वे चाहेंगी तो उन्हें कोई भी देवता को अपने सामने प्रकट कर पाएंगी

और कुंती को वो देवता वरदान देगा महाभारत युद्ध तो कुंती ने इसी वरदान का उपयोग करके पाण्डु के पांच पुत्र प्राप्त किये जिनमे कुंती के तीन और दो माधवी के कौन्तेय थे युधिस्टर , भीम , अर्जुन माधवी के थे नकुल और सहदेव वही गांधारी ने एक पिंड को जन्म दिया जिस से एक सो पुत्र जन्म हुआ जिन्हे कौरव कहा गया और महाराज पाण्डु के पुत्रो को पांडव कहा गया आगे की महाभारत की कथा को आपको पता है ही अगर आप चाहते है की में आपको बाकि की कथा और सुनाऊ तो आप कमेंट करे राम जी राम

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