दानवीर कर्ण karan ke guru kaun the

दानवीर कर्ण आई ऐसा करने पर भानुवती के साथ ही उनकी सहेली का भी हरण हो गया तो जब कर्ण और दुर्योधन दोनों को लेकर अंगराज्य में पहुचे तो भानुवती के आग्रह करने पर की मेरे साथ मेरी सहेली का भी हरण हुआ है इस लिए मेरे साथ सुप्रिया का विवाह भी होना चाहिए

दानवीर कर्ण
दानवीर कर्ण

कर्ण की पत्नी का नाम

तो दुर्योधन और भानुवती के बल देने पर कर्ण को सुप्रिया से विवाह करना पड़ा तो कर्ण की पत्नी का नाम सुप्रिया था और उन से उनका पुत्र हुआ जिनका नाम ब्रह्स्थ था तो कर्ण के पुत्र का नाम ब्रह्स्थ था कर्ण का पुत्र कर्ण की तरह ही बहुत ही प्रतापी था और महान धनुर्धर योद्धा था और कर्ण की ही भांति ब्रह्स्थ ने भी महाभारत जेसे महान युद्ध में भाग लिया और वीरगति को प्राप्त हुआ और अंगराज कर्ण भी महाभारत के युद्ध में ही वीरगति को प्राप्त हुए

महारथी कर्ण के पास एक अभेद्य कवच था जो कि उन्हें यह कवच उनके पिता की कृपा से प्राप्त हुआ था महारथी कर्ण को कवच जन्म से ही उनके साथ मिला था दानवीर कर्ण को कवच और कुंडल यह दो चीज जन्म से प्राप्त थी जब भी कर्ण पर कोई भी विपता आती तो यह कवच और कुंडल उनकी रक्षा करते कर्ण के पिता का नाम सूर्य देव था

karan ke guru kaun the
karan ke guru kaun the

कर्ण के गुरु कौन थे

कर्ण जो कि एक महान धनुर्धर था क्योंकि कर्ण के गुरु का नाम परशुराम था परशुराम भगवान ने 21 बार धरती को क्षत्रियों से विहीन किया है जब कर्ण परशुराम से शिक्षा प्राप्त करने गए तो उन्हें एक झूठ का सहारा लेना पड़ा वह झूठ परशुराम के सत्या का तेज नहीं सह सका इसी के कारण कर्ण की मृत्यु हुई करण ने कहा कि वह ब्राह्मण है

क्योंकि कर्ण और परशुराम से शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे और परशुराम केवल ब्राह्मणों को शिक्षा देते थे जब परशुराम को सत्य का पता चला तो इसलिए परशुराम ने उन्हें श्राप दिया कि जब तुम्हें मेरी विद्या की सबसे ज्यादा जरूरत होगी तब तुम्हें मेरी विद्या का कोई भी अक्सर याद नहीं रहेगा जब करण और अर्जुन का महाभारत में युद्ध चल रहा था

दानवीर कर्ण का अंतिम दान क्या था

तभी अंतिम क्षणों में करण की शिक्षा समाप्त हो गई तभी अर्जुन ने कर्ण का वध कर दिया इस युद्ध से पहले भगवान इंदर ने कर्ण से उनके कुंडल और कवच दान में ले लिए क्योंकि उन्हें भय था की अगर कर्ण से उनके कुंडल और कवच नहीं लिए तो कर्ण का मरना लगभग असंभव है तो ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि अर्जुन के पिता का नाम इन्द्र है इस दान के बाद कर्ण को दानवीर कर्ण से विख्यात हुए

karna of mahabharata

कर्ण अपने वचन पर अडिग रहने वाले महान योद्धा थे कर्ण ने जातिवाद के खिलाफ़ युद्ध लड़ा जो ऊँच नीच के खिलाफ़ था कर्ण जन्म को नही बल्कि कर्म को महान मानते थे गरीबी के आगे सभी ने घुटने टेके चाहे आप गुरु द्रोणाचार्य को लो या क्रिपाचार्य लेकिन कर्ण ने हालात के आगे घुटने नही टेके बल्कि सामने करने की सिख दी हां एक काम कर्ण से गलत हुआ

जो कर्ण ने युर्योधन का हाथ थामा वही अगर वे धर्म का पक्ष लेते तो आज महाभारत का वाक्य अलग होता मेरा नमन है एसी विभूति को अगर कथा अच्छी लगे तो आप कमेन्ट करे जय श्री राम!

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