गणेश श्लोक मंत्र गणेश जी की आरती | ganesh ki kahani

गणेश श्लोक मंत्र गणेश जी की आरती की महिमा जिनका श्रवण एवं कीर्तन करके संसार-सागरमें डूबते-उतराते प्राणी सरलतासे इससे पार हो जाते हैं।

वे परम उदार प्रभु अपनी अहैतुकी कृपासे ऐसी लीलाएँ करते हैं, जो जीवको उसके उद्धारका मार्ग | बतलाती हैं।

प्राणियोंके उद्धारके लिये ही
वे परम प्रकाशक, सबके परमाराध्य स्वयं अपने द्वारा अपनी ही आराधना करते हैं।

भक्तिका मङ्गलमय मार्ग अपने आचरणसे वे प्रभु दिखलाते हैं और फिर उस मार्गपर | चलनेवालेको स्वयं अपनाते हैं।

ganesh ji ki aarti
गणेश श्लोक मंत्र गणेश जी की आरती

गणेश श्लोक मंत्र ganesh ji ki aarti

भगवान्के इन अनन्त नित्य चिन्मय रूपोंमें पाँच रूप हमारे सामाजिक संस्कारोंमें प्रमुखतासे पूजित होते हैं

१. भगवान् नारायण, २. भगवान् शिव, ३. भगवती महाशक्ति, ४. भगवान् सूर्य, एवं ५. भगवान् गणपति। इनमें भी भगवान् गणपति सभी आराधनाओं एवं मङ्गल कार्योंमें प्रथम पूज्य माने जाते हैं।

श्रीगणेशजीके प्रथम पूज्य होनेकी अनेक कथाएँ मिलती हैं। वे रुद्रगणोंके अधिपति हैं, अत: उनकी प्रथम पूजा करनेसे कार्य निर्विघ्न समाप्त होता है।

उस कार्यमें रुद्रगण कोई विघ्न उपस्थित नहीं करते। जब | सृष्टिके प्रारम्भमें देवताओंमें प्रथम पूज्य किसे माना जाय,

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इस प्रश्न के उठाने के बाद सभी देवता उपाय के लिय भगवान ब्रमाजी के पास गये ! भगवान ब्रमाजी ने इस प्रश्न पर विचार किया

और कहा की जो देव या देवी प्रथ्वी के चारो और चकर लगाये गा , वही देव इस संसार में प्रथम पूज्य देव होगा!

गणेशजीका शरीर स्थूल है, वे लम्बोदर हैं और उनका वाहन है चूहा। देवताओंमें अनेकोंके | वाहन पक्षी हैं। कुछ रथपर, अश्वपर या हाथीपर विराजते हैं।

गणेश श्लोक मंत्र

उन सबके साथ भला गणेशजी कैसे दौड़ सकते थे?

देवर्षि नारदजीकी सम्मतिसे गणेशजीने भूमिपर ‘राम’ यह भगवान्का नाम लिखा और उसीकी सात प्रदक्षिणा करके ब्रह्माजीके पास पहुँच गये। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने

उन्हींको प्रथम पूज्य बताया; क्योंकि ‘राम’ नाम तो | साक्षात् श्रीरामका स्वरूप है और श्रीरामके तो रोम

रोम में कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड हैं। श्रीगणेशजीने रामनामकी परिक्रमा करके समस्त ब्रह्माण्डोंकी परिक्रमा कर ली थी।

जय गणेश देवा, गणेश जी की आरती

श्री गणेशजीने और भगवान् शङ्कर एवं पार्वतीजी

एक कथा ऐसी भी है कि श्रीगणेशजीने भगवान् शङ्कर एवं पार्वतीजीकी ही प्रदक्षिणा की; क्योंकि ‘माता साक्षात् क्षितेस्तनुः’

अर्थात् माता साक्षात् पृथ्वीरूप एवं पिता like प्रजापतिके स्वरूप हैं। कल्पभेदसे दोनों ही कथाएँ सत्य हैं। श्रीगणेशजी तो भगवान्के ही स्वरूप हैं और नित्य हैं।

उन्होंने इस प्रकार भगवन्नामकी श्रेष्ठता तथा । माता-पिताकी भक्तिका आदर्श स्थापित किया और

बताया कि केवल शरीरके बल या दूसरे लौकिक | साधनोंसे होनेवाली सफलता झूठी है और उसपर विश्वास करनेवाला कभी भी धोखा खा सकता है।

कोई किसी प्रकारकी भी सफलता चाहता हो, उसे भगवान्का

ही आश्रय लेना चाहिये। मङ्गलमूर्ति गणेशजीकी प्रथम | पूजा सभी विघ्नोंको तो दूर करती ही है, भगवान्के

ganesh ki kahani चरणों में ही सब ओरसे लगनेका आदर्श भी उसमें है। सुबह-सुबह गणेश जी की आरती की बड़ी विस्तृत कथाएँ हैं। उनका उपनिषद् है, गणेश-गीता है। सभी मनन करने योग्य हैं।

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